गोवर्धन में श्री राधा कृष्ण की अनेक लीला स्थलि है। एक शिला पर करवाचौथ का चाँद विद्यमान है, तो एक स्थान पर भगवान शिव गोपेश्वर महादेव गोपी रूप से विराजमान हैं जिन्होंने महारास का दर्शन किया था। गोवर्धन की एक शिला में कटोरा बना हुआ है जो श्री कृष्ण का कटोरा है जिसमे उन्होंने माखन दही खाया है। एक शिला पर श्री कृष्ण की गाय के खूर के चिन्ह है। एक स्थान पर श्री कृष्ण के एक चरण चिन्ह विद्यमान है, यहीं एक चरण पर विराजमान हो श्री कृष्ण ने बांसुरी बजायी थी और गायों को चराया था। एक शिला पर सुरभि गाय के खूर के चिन्ह हैं, वहीँ एक शिला पर हनुमान जी की परछाई विद्यमान है जब वे संजीवनी बूटी लेजा रहे थे। एक स्थान पर फिसलनी शिला है जहाँ श्री कृष्ण सखाओं संग खेलते थे। वहीँ पर श्री कृष्ण के 10 उँगलियों के चिन्ह अंकित हैं। श्री बलराम जी लुक-लुक दाऊ जी के रूप में विराजमान हैं। यहीं से बलराम जी ने छुप कर महारास का दर्शन किया था, इसलिए इनका नाम लुक-लुक दाऊजी हुआ, पास में रेवती माता विराजमान हैं। निकट में ही एक शिला पर बलराम जी के नेत्र अंकित हैं। लुक-लुक दाऊजी मंदिर के समीप में शेषनाग एक शिला पर अंकित हैं, ये साल में एक बार शरद पूर्णिमा की मध्य रात्रि को यहीं से बाहर आते हैं और कुछ समय विचरण करने के बाद यहीं अंतर्ध्यान हो जाते हैं। निकट ही में एक शिला पर इंद्रधनुष और शंख के चिन्ह हैं। एक समय श्री कृष्ण गाय चराते समय एक शिला पर विश्राम करने लगे, इसीसे उनके कान के चिन्ह उस शिला पर अंकित हो गए, जो लुक-लुक दाऊजी मंदिर के समीप में स्थित है। मुखारविंद में ही श्री कृष्ण ने गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठ ऊँगली पर धारण किया था। यहीं एक शिला पर बलराम जी के पंजे के चिन्ह अंकित हैं। जब सुरभि गाय स्वर्ग से इंद्र के साथ श्री कृष्ण के दर्शन करने आई थी तो यहीं एक शिला पर सुरभि गाय के थनों से दूध झरने लगा जो शिला पर अंकित हो गया, आज भी वह शिला मुखारविंद में विराजमान है। सुरभि गाय के संग स्वर्ग से एक घोडा भी आया था जिसका नाम श्यामकर्ण था, उसके खूर एक शिला पर विद्यमान है। इनके समीप में एक शिला पर इंद्र के वाहन ऐरावत के पैरों के चिन्ह अंकित हैं।
स्थान :
गोवर्धन में जतीपुरा से मानसी गंगा के मध्य मुखारविंद स्थित है।

