जो जातें जामैं बहुरि, जा हित कहियत वेष ।
सो सब प्रेमहिं प्रेम है, जग रसखानि असेष ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (46)
जिसमें जाने के बाद वापस लौटने की संभावना नहीं रहती, और जिसके कारण यह मानव-वेष प्राप्त हुआ है—वह सब प्रेम ही प्रेम है; इसके अतिरिक्त संसार असार है।
सो सब प्रेमहिं प्रेम है, जग रसखानि असेष ॥
- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (46)
जिसमें जाने के बाद वापस लौटने की संभावना नहीं रहती, और जिसके कारण यह मानव-वेष प्राप्त हुआ है—वह सब प्रेम ही प्रेम है; इसके अतिरिक्त संसार असार है।

