अब हौं कासौं बैर करौं - श्री बिहारिन देव , श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (98)

अब हौं कासौं बैर करौं - श्री बिहारिन देव , श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (98)

अब हौं कासौं बैर करौं ।
ऐसे कहत पुकारें श्रीमुख, घट-घट हौं विहरों ॥ [1]
तौ कहियत अपराधी जन, जो अज्ञा पग न धरौं ।
दूजी किये ते बहुत बिगूचे, हौं हूँ नरक परौं ॥ [2]
प्रानी सब समान अवलोकौं, भक्तनि अधिक डरौं । 
बिहारीदास हरिदास कृपा तैं, नित निरभै बिचरौं ॥ [3]
- श्री बिहारिन देव , श्री बिहारिन देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (98)

श्री बिहारीजी स्वयं अपने श्रीमुख से पुकार-पुकार के इस बात को कह रहे हैं कि "प्राणिमात्र के घट-घट में सदाकाल मैं ही विराजता हूँ ", तब हम किससे वैर कर सकते हैं ? [1]

उसपर भी यदि हम श्रीहरि की आज्ञा में नहीं चलेंगें, तो महान अपराधी समझे जायेंगे क्योंकि श्रीहरि की अवज्ञा करने पर अर्थात् जीवों में बिहारीजी के अतिरिक्त दूसरे को देखने वाले बहुत से मारे गये हैं । आज्ञा के प्रतिकूल चलने में तो हमको नर्क भी जाना पड़ेगा । [2]

इसलिए हम प्राणिमात्र को एक समान ही देखते हैं । श्रीहरि के भक्तों से तो सदाकाल हम बहुत ही डरते हैं कि कहीं इनके प्रति कोई अपराध न बन जाए । श्री बिहारिन देव जी महाराज कहते हैं कि श्रीस्वामीजी महाराज की कृपा से अब हम अति निर्भय होकर, श्रीवृन्दावन में नित्य विचरण करते हैं । [3]