याही तैं, रसिकन की बानी, गहि तू तत्त्व छनी है ।
को भटकै अब छाँड़ि किशोरी, अनत बिवाद धनी है ॥
- श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (13)
रसिकों की वाणी परम तत्त्व का सार है, क्योंकि उसमें श्री श्यामाश्याम का नित्य निवास है। श्री किशोरी जी के चरणों की शरण को छोड़कर भटकने में क्या लाभ होगा, अन्यत्र तो मात्र वाद-विवाद ही है ।
को भटकै अब छाँड़ि किशोरी, अनत बिवाद धनी है ॥
- श्री किशोरी अलि, मन शिक्षा (13)
रसिकों की वाणी परम तत्त्व का सार है, क्योंकि उसमें श्री श्यामाश्याम का नित्य निवास है। श्री किशोरी जी के चरणों की शरण को छोड़कर भटकने में क्या लाभ होगा, अन्यत्र तो मात्र वाद-विवाद ही है ।

