वन विहरन चले दोऊ प्यारे ।
नाँचत-गावत प्रेम बढ़ावत, रूप-रासि त्रिभुवन उजियारे ॥ [1]
करत हास-परिहास परस्पर, काम सु भेद जनावत न्यारे ।
जैश्री कमलनैंन हित रसिकनि कौ धन, जीवन प्राण हमारे ॥ [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (65)
श्री श्यामा श्याम वन-विहार करने चले हैं । दोनों नृत्य एवं गान करते हुए सखियों के ह्रदय में प्रेम बढ़ा रहे हैं, दोनों रूप की राशि हैं एवं तीनों लोकों के अंधकार को मिटानेवाले हैं । [1]
दोनों श्री श्यामाश्याम परस्पर हास-परिहास करते हुए विचरण कर रहे हैं और अपने नित्य नवीन दिव्य प्रेमाकर्षण से कामदेव को भी लज्जित कर रहे हैं । श्री कमलनैन जी कहते हैं "रसिकों के परम धन, जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम मेरे जीवन-प्राण हैं ।" [2]
नाँचत-गावत प्रेम बढ़ावत, रूप-रासि त्रिभुवन उजियारे ॥ [1]
करत हास-परिहास परस्पर, काम सु भेद जनावत न्यारे ।
जैश्री कमलनैंन हित रसिकनि कौ धन, जीवन प्राण हमारे ॥ [2]
- श्री हित कमलनैन, श्री हित कमलनैन जी की वाणी, अष्टायामी पदावली (65)
श्री श्यामा श्याम वन-विहार करने चले हैं । दोनों नृत्य एवं गान करते हुए सखियों के ह्रदय में प्रेम बढ़ा रहे हैं, दोनों रूप की राशि हैं एवं तीनों लोकों के अंधकार को मिटानेवाले हैं । [1]
दोनों श्री श्यामाश्याम परस्पर हास-परिहास करते हुए विचरण कर रहे हैं और अपने नित्य नवीन दिव्य प्रेमाकर्षण से कामदेव को भी लज्जित कर रहे हैं । श्री कमलनैन जी कहते हैं "रसिकों के परम धन, जुगल किशोर श्री श्यामाश्याम मेरे जीवन-प्राण हैं ।" [2]

