गिरिराज जी के सभी तीर्थों में उनके अंगों की भावना की गई है, उसी क्रम में "पूच्छ कुंडे तथा पुच्छं" इस स्थान पर पूँछ की भावना की गई है । नवल कुण्ड का पौराणिक नाम ही पुच्छ कुण्ड है । इसलिए भी यह स्थान पूँछरी नाम से विख्यात है ।
- गर्ग संहिता, गिरिराज खण्ड (8/11)
ब्रजवासियों के अपने मत में -
मयूराकार गिरिराज जी (कतिपय की भावनानुसार गौ-आकार गिरिराज जी) की पूँछ के रूप में इसे मानते हैं । इसी कारण गाँव का नाम पूँछरी है। गिरिराज जी के दक्षिण छोर पर पूँछरी के लौठा का मन्दिर है, इसमें उनका लम्बा चौड़ा सिंदूर चर्चित विग्रह दर्शनीय है । श्री कृष्ण जब द्वारिका जाने लगे तो उन्होंने अपने प्रिय मित्र लौठा से भी चलने को कहा । लौठा ने कहा - "मैं ब्रज तज अन्यत्र नहीं जाऊँगा किन्तु तुम्हारे बिना मैं अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करूँगा" तो श्री कृष्ण बोले - "मैं लौटकर न आ जाऊँ, तब तक तुम बिना अन्न-जल के भी प्राण त्याग नहीं कर सकते, तुम यहाँ गोवर्धन की परिक्रमा करनेवाले भक्तों की हाजरी रखना ।" तभी से वे यहाँ तपस्यारत हैं, बिना खाए-पिए ही पुष्ट हैं ।
श्रीकृष्ण द्वारका चले गए और गोपियां ब्रज में हीं रहीं। ब्रज में 9 लाख गोपियाँ थीं और सभी श्रीकृष्ण को ब्रज में खोज रहीं थीं । एक गोपी जानती थी कि कृष्ण का एक मित्र गोवर्धन में रहता है और गोवर्धन की परिक्रमा करने वाले भक्तों का साक्षी रहता है । उसने सभी गोपियों से कहा कि चलो उसके पास जाकर कृष्ण का पता पूछें । तब सभी गोपियाँ यहाँ गोवर्धन में लौठा जी से कृष्ण के बारे में पूछने के लिए आईं। एक गोपी ने दूसरे को कहा "सखी तू पूछ री", और दूसरे गोपी ने दूसरे गोपी से कहा "सखी तू पूछ री", इसलिए इस स्थान को "पूँछरी" नाम मिला । जब गोपियां लौठा जी से कृष्ण के बारे में पूछकर लौट गयीं, तो लौठा जी को "पूँछरी का लौठा" नाम मिला ।
इन्हें अन्न के स्थान पर माखन-मिश्री का भोग लगता है । श्री कृष्ण के आदेशानुसार गोवर्धन की परिक्रमा पूँछरी के लौठा के दर्शन बिना सम्पूर्ण नहीं होती ।
अन्न खाय नहिं पानी पीवै तोऊ तू परयौ सिलौटा ।
दूध न छोड़ै दधि न छोड़ै अरे तू तो पी गयो छाछ कठौता ॥
तू धनि धनि पूँछरी के लौठा ।
कहकर ब्रजवासी जन इनको बड़ा सम्मान देते हैं। गिरिराज महाराज की 'जय ध्वनि' के साथ पूँछरी के लौठा का जयघोष ब्रजवासी अवश्य करते हैं।
स्थान :
पूँछरी का लौठा गिरिराज जी के दक्षिण छोर पर पूँछरी ग्राम में अप्सरा कुण्ड एवं नवल कुण्ड के समीप में स्थित है ।
- गर्ग संहिता, गिरिराज खण्ड (8/11)
ब्रजवासियों के अपने मत में -
मयूराकार गिरिराज जी (कतिपय की भावनानुसार गौ-आकार गिरिराज जी) की पूँछ के रूप में इसे मानते हैं । इसी कारण गाँव का नाम पूँछरी है। गिरिराज जी के दक्षिण छोर पर पूँछरी के लौठा का मन्दिर है, इसमें उनका लम्बा चौड़ा सिंदूर चर्चित विग्रह दर्शनीय है । श्री कृष्ण जब द्वारिका जाने लगे तो उन्होंने अपने प्रिय मित्र लौठा से भी चलने को कहा । लौठा ने कहा - "मैं ब्रज तज अन्यत्र नहीं जाऊँगा किन्तु तुम्हारे बिना मैं अन्न-जल भी ग्रहण नहीं करूँगा" तो श्री कृष्ण बोले - "मैं लौटकर न आ जाऊँ, तब तक तुम बिना अन्न-जल के भी प्राण त्याग नहीं कर सकते, तुम यहाँ गोवर्धन की परिक्रमा करनेवाले भक्तों की हाजरी रखना ।" तभी से वे यहाँ तपस्यारत हैं, बिना खाए-पिए ही पुष्ट हैं ।
श्रीकृष्ण द्वारका चले गए और गोपियां ब्रज में हीं रहीं। ब्रज में 9 लाख गोपियाँ थीं और सभी श्रीकृष्ण को ब्रज में खोज रहीं थीं । एक गोपी जानती थी कि कृष्ण का एक मित्र गोवर्धन में रहता है और गोवर्धन की परिक्रमा करने वाले भक्तों का साक्षी रहता है । उसने सभी गोपियों से कहा कि चलो उसके पास जाकर कृष्ण का पता पूछें । तब सभी गोपियाँ यहाँ गोवर्धन में लौठा जी से कृष्ण के बारे में पूछने के लिए आईं। एक गोपी ने दूसरे को कहा "सखी तू पूछ री", और दूसरे गोपी ने दूसरे गोपी से कहा "सखी तू पूछ री", इसलिए इस स्थान को "पूँछरी" नाम मिला । जब गोपियां लौठा जी से कृष्ण के बारे में पूछकर लौट गयीं, तो लौठा जी को "पूँछरी का लौठा" नाम मिला ।
इन्हें अन्न के स्थान पर माखन-मिश्री का भोग लगता है । श्री कृष्ण के आदेशानुसार गोवर्धन की परिक्रमा पूँछरी के लौठा के दर्शन बिना सम्पूर्ण नहीं होती ।
अन्न खाय नहिं पानी पीवै तोऊ तू परयौ सिलौटा ।
दूध न छोड़ै दधि न छोड़ै अरे तू तो पी गयो छाछ कठौता ॥
तू धनि धनि पूँछरी के लौठा ।
कहकर ब्रजवासी जन इनको बड़ा सम्मान देते हैं। गिरिराज महाराज की 'जय ध्वनि' के साथ पूँछरी के लौठा का जयघोष ब्रजवासी अवश्य करते हैं।
स्थान :
पूँछरी का लौठा गिरिराज जी के दक्षिण छोर पर पूँछरी ग्राम में अप्सरा कुण्ड एवं नवल कुण्ड के समीप में स्थित है ।

