पगीं प्रेम नंदलाल कैं, हमैं न भावत जोग - श्री मतिराम, मतिराम सतसई (621)

पगीं प्रेम नंदलाल कैं, हमैं न भावत जोग - श्री मतिराम, मतिराम सतसई (621)

पगीं प्रेम नंदलाल कैं, हमैं न भावत जोग ।
मधुप राजपद पाइकै, भीख न माँगत लोग ॥

- श्री मतिराम, मतिराम सतसई (621)

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं—हे भ्रमर! हम तो श्री कृष्ण के प्रेम में निमग्न हैं, इसलिए तुम्हारी योग-ज्ञान (निरगुण) की बातें हमें अच्छी नहीं लगतीं। जब राजपद मिल जाए, तो फिर कौन भिक्षा माँगता फिरेगा? अर्थात् हमें तो प्रेम-राज्य मिल गया है, अब योग की भिक्षा क्यों लें?