यस्या रेणु पादयोर्विश्वभर्ता धरते मूर्ध्नि प्रेमयुक्तः ।
स्रस्तवेणुः कवरीं न स्मरेद्य, तल्लीन कृष्ण क्रीतयत्ता नमामी ॥
- राधिकातापनीय उपनिषद (7)
विश्वभर्ता श्रीकृष्णचन्द्र एकान्त में अत्यन्त प्रेमार्द्र होकर जिनकी पद-धूलि अपने मस्तक पर धारण करते हैं, जिनके प्रेम में निमग्न होने पर उनके हाथ से वंशी भी गिर जाती है एवं अपनी बिखरी अलकों का भी उन्हें स्मरण नहीं रहता तथा ये क्रीतदास की तरह जिनके वश में सदा रहते हैं, उन राधिका को हम नमस्कार करते हैं ।

