श्रीबिहारीजू खेलत बसंत - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)

श्रीबिहारीजू खेलत बसंत - श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)

(राग वसन्त)
श्रीबिहारीजू खेलत बसंत ।
रंग भरी सब सखी विराजत राधे जू रूप लसंत ॥ [1]
फूले जोवन मौर मंजरी अधर पान उलहंत ।
आयौ मदन मनों सैन साजि कैं चँवर चिकुर ढरंत ॥ [2]
छूटत मूक झूक सौरभ की नैंन गुलाल उडंत ।
कूजत मधुकर मंजीर कोकिला बाजे बजत अनंत ॥ [3]
मच्यौ परस्पर खेल कटाक्षिन क्रीडत भामिनि कंत ।
श्रीरसिकबिहारी को सुख निरखत धीरज कौन धरंत ॥ [4]

- श्री रसिक देव जी, श्री रसिक देव जी की वाणी, सिद्धांत के पद (20)

श्रीबिहारी जी वसन्तका खेल-खेल रहे हैं । आनन्द से भरी सब सखियाँ भी वहाँ उपस्थित हैं और हैं श्री किशोरी जी जिनके प्रत्येक अंग में रूप खिला है । [1]

इनके अंग-अंग में यौवन आम्रमंजरी की तरह फूल रहा है । अधर पल्लव तथा पाणि-पल्लव नूतन किसलयों की भाँति लहलहा रहे हैं । उच्छ्व सित अलकावलि के रूप में उस कामदेव का चँवर ढुरक रहा है, जो अपनी सेना सजाकर इस रस क्षेत्र में आ डटा है । [2]

प्रत्यंग से निरन्तर चुपचाप झरने वाले सौरभ के रूप में पराग कण बरस रहे हैं । नयनों से अनुराग का अबीर उड़ रहा है । नूपर-मेखला वलय-केयूर आदि वाद्यों की झङ्कार के रूप में जो अनन्त ध्वनि हो रही है, उसके बीच-बीच में खिलखिलाकर हँस पड़ने से ऐसा लगता है जैसे कोयलें चहक उठी हों । [3]

प्रिया-प्रियतम की रसमय वसन्त-क्रीड़ामें कटाक्षों का खेल अलग ही चलता रहता है । प्रेम-रस के लिए प्रति पल लालायित रहने वाले इन युगल रसिकों के केलि-सुख को देखकर भी जो अपने धैर्य पर अडिग रह सके ऐसा तीनों लोकों में भला कौन होगा ? [4]