(राग धनाश्री)
तेरे नैंन करत दोऊ चारी ।
अति कुलकात समात नहीं कहुँ मिले हैं कुंज विहारी ॥ [1]
विथुरी माँग कुसुम गिरि गिरि परैं, लटकि रही लट न्यारी ।
उर नख रेख प्रकट देखियत हैं, कहा दुरावति प्यारी ॥ [2]
परी है पीक सुभग गंडनि पर, अधर निरँग सुकुमारी ।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग अँग भारी ॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (21)
[हे राधे !] तेरी दोनों आँखें ही तो चारी (चुगल खोरी) कर रही हैं, बता रही हैं ! कितनी प्रसन्न है ये ? इनकी प्रसन्नता मानो कहीं समाती नहीं [इसी से विदित होता है कि तुझे कहीं न कहीं कुञ्ज बिहारी] (श्रीलालजी) [अवश्य] मिले हैं। [1]
अरी ! तेरी माँग भी तो विखर गयी है और उसमें से फूल झर झर कर गिर पड़ते हैं साथ ही केश लट भी (कबरी से) अलग ही लटक रही है। हे प्यारी ! छिपाती क्यों हो ? वक्ष स्थल पर चिह्नित नख रेखा कितनी स्पष्ट देख रही हूँ मैं । [2]
सुकुमारी के अधर फीके हो चुके हैं एवं सुन्दर कपोलों पर पीक भी अङ्कित है । श्रीहित हरिवंश चन्द्र [सखी भाव से] कहते हैं "अहो रसिक मणि भामिनि ! तेरे अङ्ग–अङ्ग में कितना भारी आलस्य है, [जो रात्रि के जागरण एवं रति श्रम का द्योतक हैं ।] [3]
तेरे नैंन करत दोऊ चारी ।
अति कुलकात समात नहीं कहुँ मिले हैं कुंज विहारी ॥ [1]
विथुरी माँग कुसुम गिरि गिरि परैं, लटकि रही लट न्यारी ।
उर नख रेख प्रकट देखियत हैं, कहा दुरावति प्यारी ॥ [2]
परी है पीक सुभग गंडनि पर, अधर निरँग सुकुमारी ।
(जै श्री) हित हरिवंश रसिकनी भामिनि, आलस अँग अँग भारी ॥ [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (21)
[हे राधे !] तेरी दोनों आँखें ही तो चारी (चुगल खोरी) कर रही हैं, बता रही हैं ! कितनी प्रसन्न है ये ? इनकी प्रसन्नता मानो कहीं समाती नहीं [इसी से विदित होता है कि तुझे कहीं न कहीं कुञ्ज बिहारी] (श्रीलालजी) [अवश्य] मिले हैं। [1]
अरी ! तेरी माँग भी तो विखर गयी है और उसमें से फूल झर झर कर गिर पड़ते हैं साथ ही केश लट भी (कबरी से) अलग ही लटक रही है। हे प्यारी ! छिपाती क्यों हो ? वक्ष स्थल पर चिह्नित नख रेखा कितनी स्पष्ट देख रही हूँ मैं । [2]
सुकुमारी के अधर फीके हो चुके हैं एवं सुन्दर कपोलों पर पीक भी अङ्कित है । श्रीहित हरिवंश चन्द्र [सखी भाव से] कहते हैं "अहो रसिक मणि भामिनि ! तेरे अङ्ग–अङ्ग में कितना भारी आलस्य है, [जो रात्रि के जागरण एवं रति श्रम का द्योतक हैं ।] [3]

