अहो बृषभानुजे किसोरी श्रीबनवास दै बसावौ ।
मीठे बैनन कहि 'यह मेरौ' मेरौ हिय हुलसावौ ॥ [1]
'परम कृपाल तुरत ही रीझत' जिन यह बिरद हँसावौ ।
सर्वेस्वरी हरि प्रिये राधिके बाधा दूरि नसावौ ॥ [2]
निजजन बिसरै क्यूं बनै श्रीबृन्दाबन रानी ।
मेरी भूलि अनादि की तुम नहीं पहिचानी ? [3]
अपनी ओर निहारिये येहो सुखदानी ।
सब गुनहीन बह्यो फ़िरौं नहिं बात रहानी ॥ [4]
रूखे जिन बलि हूजिये राधे दिलजानी ।
उत् पथ अपनी चाल सौं कहि नेक न मानी ॥
गोबिंदसरन भल देखिये जित आनाकानी । [5]
- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (110)
हे वृषभानु नंदिनी, मुझे श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये । मधुर स्वर में 'यह मेरा है', ऐसा कहकर मेरे ह्रदय में आनंद का संचार कीजिये । [1]
रसिकों के कथनानुसार 'आप परम कृपालु हैं एवं तुरंत ही रीझ जाती हैं', इस कथन को झूठा न होने दें । हे सर्वेश्वरी, हे हरिप्रिये श्री राधिके, मेरी बाधाओं को नष्ट कीजिये । [2]
हे श्री वृन्दावन रानी, आप अपने निज जनों को क्यूँ भूलें? मैं तो अनादि काल से आपको माया वश भुला हुआ हूँ, क्या आप यह नहीं जानतीं ? [3]
हे किशोरी, आप अपने सहज, दयालुता एवं कृपालुता स्वभाव की ओर निहारिये, मैं तो समस्त गुणों से हीन हूँ, भव सागर में बहा जा रहा हूँ, कोई भी उपदेश मेरे ह्रदय में स्थिर नहीं रहता । [4]
हे स्वामिनी, आप मुझसे रूखे न रहना, आप तो मेरा हृदय जानती हैं । मैं तो अपने स्वाभाव-वश अपनी चाल से उस पथ पर चल रहा हूँ, किसी की बात नहीं मानी । श्री गोविंद शरण जी कहते हैं "हे श्री राधे, अब आप देरी क्यों करती हो, मुझे अपनी सेवा में स्वीकार कीजिये ।" [5]
मीठे बैनन कहि 'यह मेरौ' मेरौ हिय हुलसावौ ॥ [1]
'परम कृपाल तुरत ही रीझत' जिन यह बिरद हँसावौ ।
सर्वेस्वरी हरि प्रिये राधिके बाधा दूरि नसावौ ॥ [2]
निजजन बिसरै क्यूं बनै श्रीबृन्दाबन रानी ।
मेरी भूलि अनादि की तुम नहीं पहिचानी ? [3]
अपनी ओर निहारिये येहो सुखदानी ।
सब गुनहीन बह्यो फ़िरौं नहिं बात रहानी ॥ [4]
रूखे जिन बलि हूजिये राधे दिलजानी ।
उत् पथ अपनी चाल सौं कहि नेक न मानी ॥
गोबिंदसरन भल देखिये जित आनाकानी । [5]
- श्री गोविंद शरण देवाचार्य, श्री गोविन्दशरण देवाचार्य जी की वाणी (110)
हे वृषभानु नंदिनी, मुझे श्री वृन्दावन का वास प्रदान कीजिये । मधुर स्वर में 'यह मेरा है', ऐसा कहकर मेरे ह्रदय में आनंद का संचार कीजिये । [1]
रसिकों के कथनानुसार 'आप परम कृपालु हैं एवं तुरंत ही रीझ जाती हैं', इस कथन को झूठा न होने दें । हे सर्वेश्वरी, हे हरिप्रिये श्री राधिके, मेरी बाधाओं को नष्ट कीजिये । [2]
हे श्री वृन्दावन रानी, आप अपने निज जनों को क्यूँ भूलें? मैं तो अनादि काल से आपको माया वश भुला हुआ हूँ, क्या आप यह नहीं जानतीं ? [3]
हे किशोरी, आप अपने सहज, दयालुता एवं कृपालुता स्वभाव की ओर निहारिये, मैं तो समस्त गुणों से हीन हूँ, भव सागर में बहा जा रहा हूँ, कोई भी उपदेश मेरे ह्रदय में स्थिर नहीं रहता । [4]
हे स्वामिनी, आप मुझसे रूखे न रहना, आप तो मेरा हृदय जानती हैं । मैं तो अपने स्वाभाव-वश अपनी चाल से उस पथ पर चल रहा हूँ, किसी की बात नहीं मानी । श्री गोविंद शरण जी कहते हैं "हे श्री राधे, अब आप देरी क्यों करती हो, मुझे अपनी सेवा में स्वीकार कीजिये ।" [5]

