तदखिल भगवत्स्वरूप-रूपामृत रसतोऽप्यति माधुरीचूरीणम् ।
कुबलय कमनीय धाम राधापदरसपूर्णबने भ्रमद् भजामः ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.84)
अखिल भगवत्स्वरूपों के रूपामृत रस से भी अतिशय माधुर्य-मण्डित श्रीराधापद - कमल-रस से पूर्ण वन में भ्रमण करनेवाले उस सुप्रसिद्ध कुवलयवत् (नीलकमलवत् ) विग्रह ( श्यामसुन्दर ) का हम भजन करते हैं ।
कुबलय कमनीय धाम राधापदरसपूर्णबने भ्रमद् भजामः ॥
- श्री प्रबोधानन्द सरस्वती, वृन्दावन महिमामृत (1.84)
अखिल भगवत्स्वरूपों के रूपामृत रस से भी अतिशय माधुर्य-मण्डित श्रीराधापद - कमल-रस से पूर्ण वन में भ्रमण करनेवाले उस सुप्रसिद्ध कुवलयवत् (नीलकमलवत् ) विग्रह ( श्यामसुन्दर ) का हम भजन करते हैं ।

