(राग पूर्वी)
मो मन गिरधर छबि पै अटक्यो ।
ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै,
चिबुक चारु गड़ि ठटक्यो ॥ [1]
सजल स्याम घन वरन लीन ह्वै,
फिर चित्त अनत न भटक्यो ।
'कृष्णदास' किये प्राण निछावर,
यह तन जग सिर पटक्यो ॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1090)
"मेरा हृदय गिरधर श्री कृष्ण की सुन्दर छवि पर अटका हुआ है। उनकी ललित त्रिभंग मनमोहक चाल एवं उनका सुन्दर चिबुक मेरे ह्रदय में बस गए हैं । [1]
जल से भरे मेघों के समान श्याम वर्ण वाले श्री कृष्ण में मेरा मन लीन हो गया है और अब मेरा चित्त कहीं और जाता नहीं। श्री कृष्णदास जी कहते हैं "इस देह एवं इस संसार को समर्पित कर मैं अपने प्राण भी श्री कृष्ण पर न्योंछावर करता हूँ ।" [2]
मो मन गिरधर छबि पै अटक्यो ।
ललित त्रिभंग चाल पै चलि कै,
चिबुक चारु गड़ि ठटक्यो ॥ [1]
सजल स्याम घन वरन लीन ह्वै,
फिर चित्त अनत न भटक्यो ।
'कृष्णदास' किये प्राण निछावर,
यह तन जग सिर पटक्यो ॥ [2]
- श्री कृष्णदास, श्री कृष्णदास अधिकारी जी की वाणी (1090)
"मेरा हृदय गिरधर श्री कृष्ण की सुन्दर छवि पर अटका हुआ है। उनकी ललित त्रिभंग मनमोहक चाल एवं उनका सुन्दर चिबुक मेरे ह्रदय में बस गए हैं । [1]
जल से भरे मेघों के समान श्याम वर्ण वाले श्री कृष्ण में मेरा मन लीन हो गया है और अब मेरा चित्त कहीं और जाता नहीं। श्री कृष्णदास जी कहते हैं "इस देह एवं इस संसार को समर्पित कर मैं अपने प्राण भी श्री कृष्ण पर न्योंछावर करता हूँ ।" [2]

