देखी कहुँ गलिन में मो प्राण जीवनी ।
ऐहो सुजान प्यारी मम चूक क्या विचारी ।
क्यों दुर गई लतन में, देहु दरश आनन्दनी ॥ [1]
जब चलत चाल छबि सों, तब हलत हार उर सों।
ठुम टुम चरण धरन पै तू है गति गयन्दनी ॥ [2]
तेरी छटा चरण की निंदत रवि किरण की ।
हा हा कुँवरि किशोरी तू है सुख समूहनी ॥ [3]
ये सुनत वचन मेरो, पाषाण द्रवत हेरो ।
हित रूप लाल तेरो, ऐहो दुख निकन्दनी ॥ [4]
- श्री हित रूपलाल जी
ऐहो सुजान प्यारी मम चूक क्या विचारी ।
क्यों दुर गई लतन में, देहु दरश आनन्दनी ॥ [1]
जब चलत चाल छबि सों, तब हलत हार उर सों।
ठुम टुम चरण धरन पै तू है गति गयन्दनी ॥ [2]
तेरी छटा चरण की निंदत रवि किरण की ।
हा हा कुँवरि किशोरी तू है सुख समूहनी ॥ [3]
ये सुनत वचन मेरो, पाषाण द्रवत हेरो ।
हित रूप लाल तेरो, ऐहो दुख निकन्दनी ॥ [4]
- श्री हित रूपलाल जी
हे सखी, क्या तुमने मेरी प्राणप्यारी श्री राधा को ब्रज गलियों में देखा है ?
हे प्यारे की जीवनी, मेरी भूल को आप क्यों देखती हो, आप क्यों लताओं में दूर चली गयी, मुझे अपना दर्शन दीजिये आनन्दनी श्री राधा । [1]
आपकी छवि का वर्णन कैसे करूँ, जब आप चलती हो तो आपके ह्रदय का हार हिलने लगता है, आपके चरण जब धरती पर पड़ते हैं तो आपकी गति गयन्दनी जैसी प्रतीत होती है । [2]
आपके चरणों की छटा सूर्य किरणों को फीका कर देती है, हे लाड़िली, आप समस्त सुखों की समूह हैं । [3]
श्री हित रूपलाल जी कहते हैं "हे दुखों का हरण करनेवाली, हे श्री राधा, में आपका ही हूं। मेरे इन वचनों को सुनकर अवश्य ही आपका ह्रदय द्रवित हुआ होगा ।" [4]

