धनि धनि बृंदावन के वासी - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1372)

धनि धनि बृंदावन के वासी - श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1372)

(राग धनाश्री व सारंग)
धनि धनि बृंदावन के वासी ।
नित प्रति चरन कमल अनुरागी, स्यामा स्याम उपासी ॥ [1]
या रस को जो मरम न जानै जाय बसौ सो कासी ।
भसम लगाय गरैं लिंग बाँधौ सदाइ रहौ उदासी ॥ [2]
अष्ट महासिद्धि द्वारें ठाढ़ी मुकुति चरन की दासी ।
'परमानंद' चरन कमल भजि सुंदर घोष निवासी ॥ [3]

- श्री परमानन्द दास, परमानंद सागर (1372)

धन्य धन्य हैं वृन्दावन के निवासी जो श्री श्यामाश्याम की उपासना करते हैं और नित्य ही उनके चरण कमलों के प्रेम में पगे रहते हैं । [1]

जो लोग इस दिव्य रस को नहीं समझ सकते हैं वे जाकर काशी में बस जाएं एवं अपने अंगों में भस्म रमायें, गले में शिवलिंग बांधे संसार से उदासीन रहें । [2]

आठ महा सिद्धियाँ ऐसे व्रजवासियों के द्वार पर उपस्थित रहते हैं और मुक्ति स्वयं उनके चरणों की सेवा करती हैं । श्री परमानंद दास, उनके चरणों में समर्पित हो कहते हैं "गायों की इस सुन्दर एवं पवित्र भूमि में ये व्रजवासी निवास करते हैं । [3]"