अब जिन करो अबार लड़ैती जू - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (30)

अब जिन करो अबार लड़ैती जू - श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (30)

अब जिन करो अबार लड़ैती जू, मोरी नवरिया अटकी ।
मो सौ अधम उधारन तो सो, दोऊ ओर नहीं घटकी ॥ [1]
विषय लागि तब भजन न जानौं हौं अधमन कुल राइ ।
राई सम नहीं गनत मेरु अघ, तुम करुनाकर सुखदाइ ॥ [2]
या भवसिंन्धु अगाध तरणि तरि, तेरौ ही नाम विराजै ।
श्रीललिता नाव खेवटिया जाको, आनि सकल लखि लाजै ॥ [3]

- श्री वंशी अलि, सिद्धांत के पद (30)

हे लड़ैती जू, अब देर न कीजिये, मेरी नाव भव सागर में अटकी हुई है । मेरे जैसा अधम और आपके जैसा उद्धार करनेवाला कोई और नहीं है । [1]

मैं विषय रस में डूबा हुआ हूँ, आपका भजन करना नहीं जानता, समस्त अधमों में श्रेष्ट हूँ । मेरे अपराध मेरु पर्वत के समान हैं जिसे आप राई के समान भी नहीं देखतीं, हे करुणा सागर, आप सुख प्रदान करनेवाली हैं । [2]

हे श्री राधा, यह संसार सागर अपार है, इसे पार करने का एकमात्र आपके ही नाम का सहारा है । श्री वंशी अली जी कहते हैं "इस संसार सागर में मेरी नौका की खेवटिया स्वयं श्री ललिता जू हैं, जिनके सिवा मैं और किसी को नहीं जानता ।" [3]