आदि अंत जाको नहीं, माया कों न प्रवेश - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (29)

आदि अंत जाको नहीं, माया कों न प्रवेश - श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (29)

आदि अंत जाको नहीं, माया कों न प्रवेश ।
प्रगट विराजत अवनि पर, वृंदाविपिन सुदेश ॥

- श्री रूपरसिक देवाचार्य, श्री वृंदावन माधुरी (29)

जिसका न आदि है और न अंत, जहाँ माया का प्रवेश भी नहीं होता—वही श्री धाम वृन्दावन इस पृथ्वी पर प्रकट होकर विराजमान है।