रतिं गौरीलीले अपि तपति सौन्दर्यकिरणैः शचीलक्ष्मीसत्याः परिभवति सौभाग्यवलनैः ।
वशीकारैश्चन्द्रावलिमुखनवीनव्रजसतीः क्षिपत्याराद्या तां हरिदयितराधां भज मनः ॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, मन शिक्षा (10)
हे मन! जो अपनी सौन्दर्य-किरणों से रति, गौरी एवं लीला को सन्तप्त करने वाली हैं, सौभाग्य समूह से जो इन्द्राणी, लक्ष्मी तथा सत्यभामा को पराजित करने वाली हैं और प्रियतम श्रीकृष्ण को वशीभूत करने में जो श्रीचन्द्रावली–प्रमुख नवतरुण ब्रजललनाओं को दूर निक्षेप कर देती हैं, उन श्रीहरिप्रेयसी श्रीराधा जी का भजन कर ।
वशीकारैश्चन्द्रावलिमुखनवीनव्रजसतीः क्षिपत्याराद्या तां हरिदयितराधां भज मनः ॥
- श्री रघुनाथ दास गोस्वामी, मन शिक्षा (10)
हे मन! जो अपनी सौन्दर्य-किरणों से रति, गौरी एवं लीला को सन्तप्त करने वाली हैं, सौभाग्य समूह से जो इन्द्राणी, लक्ष्मी तथा सत्यभामा को पराजित करने वाली हैं और प्रियतम श्रीकृष्ण को वशीभूत करने में जो श्रीचन्द्रावली–प्रमुख नवतरुण ब्रजललनाओं को दूर निक्षेप कर देती हैं, उन श्रीहरिप्रेयसी श्रीराधा जी का भजन कर ।

