कोटि कोटि कंचन अमूल्य रत्न राशियों का - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (78)

कोटि कोटि कंचन अमूल्य रत्न राशियों का - डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (78)

कोटि कोटि कंचन अमूल्य रत्न राशियों का,
लोभ दिखलाओ पर मुख को न मोड़ेंगे। [1]
दूर से ही छोड़ कर पिशाची कामिनी रूप,
नाता ब्रजराज से अखण्ड एक जोड़ेंगे॥ [2]
एक से भी एक दुःख दारुण सतावें क्यों न ?
प्यारे ब्रजचन्द्र से न प्रीति कभी तोड़ेंगे। [3]
छोड़ देंगे तन मन प्राण छोड़ देंगे किन्तु,
वृन्दावन वास कर प्रण को न छोड़ेंगे॥ [4]

- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (78)

श्री कृष्ण भले ही मुझे कोटि-कोटि स्वर्ण मुद्राएं एवं अमूल्य रत्नों के भण्डार का लोभ क्यों न दिखलायें, लेकिन मैं उनसे कभी मुख नहीं मोडूँगा। [1]

पिशाची कामिनी रूप को तो मैं दूर से ही छोड़कर एकमात्र ब्रजचन्द्र से ही अखंड नाता जोड़ूंगा। [2]

मुझे कठोर से कठोर दुःख ही क्यों न सहना पड़े, लेकिन श्री कृष्ण से प्रेम करना नहीं छोड़ूंगा। [3]

श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती जी कहते हैं कि "मुझे अपना तन, मन और यहाँ तक की प्राण ही क्यों न छोड़ना पड़े, लेकिन श्री वृन्दावन वास के अपने प्रण को कभी नहीं छोड़ूंगा।" [4]