त्वत्सेवा रीतिराश्चर्य लोकवेद-विलक्षणा ।
तवैव कृपया लभ्या कदा सद्गुरु सङ्गतः ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (24)
हे श्रीवृन्दावनाधीश्वरि [श्री राधे] ! आपके चरण-कमलों की सेवा रीति आश्चर्य्यमयी एवं लोक-वेद-विलक्षण है। वह केवल आपकी कृपा और सद्गुरु के संग से ही कभी प्राप्त हो सकती है । अन्य प्रकार से नहीं ।
तवैव कृपया लभ्या कदा सद्गुरु सङ्गतः ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (24)
हे श्रीवृन्दावनाधीश्वरि [श्री राधे] ! आपके चरण-कमलों की सेवा रीति आश्चर्य्यमयी एवं लोक-वेद-विलक्षण है। वह केवल आपकी कृपा और सद्गुरु के संग से ही कभी प्राप्त हो सकती है । अन्य प्रकार से नहीं ।

