राधाजू ! मोपै आजु ढरौ - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (17)

राधाजू ! मोपै आजु ढरौ - श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (17)

(राग आसावरी - तीन ताल)
राधाजू ! मोपै आजु ढरौ ।
निज, निज प्रितम की पद-रज रति, मोय प्रदान करौ ॥ [1]
बिषम बिषय-रस की सब आसा-ममता तुरत हरौ।
भुक्ति मुक्ति की सकल कामना, सत्वर नास करौ ॥ [2]
निज चाकर-चाकर-चाकर की सेवा-दान करौ ।
राखौ सदा निकुंज निभृत में झाड़ूदार बरौ ॥ [3]

- श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार (भाईजी), पद रत्नाकर, वंदना एवं प्रार्थना (17)

हे श्री राधा, आज मुझपर अपनी करुणा दृष्टि कीजिये । अपनी एवं अपने (निज) प्रियतम श्री कृष्ण की चरण रज की रति मुझे प्रदान कीजिये । [1]

मेरे ह्रदय में स्थित विषय-रस की विषम कामनाओं की आशा एवं ममता का शीघ्र हरण कीजिये । संसार की भोग एवं मुक्ति की समस्त कामनाओं का भी नाश कीजिये । [2]

हे श्री राधा, अपनी निज दासी की दासी की दासी की सेवा प्रदान कीजिये । श्री हनुमान प्रसाद पोद्दार जी कहते हैं कि हे राधे, मुझे सदा के लिए अपने निभृत निकुंज में सोहनी की सेवा प्रदान कीजिये । [3]