अधम उधारन नाम सुनि, उर आशा बढ़ि जात ।
भक्ति वश्य सुनि नाम पै, मन महँ अति डरपात ॥
- जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (90)
हे श्री कृष्ण! तुम्हारा पतित-पावन नाम सुनकर मन में आशा उत्पन्न होती है, क्योंकि मैं पतित हूँ और मेरा भी काम बन सकता है। किंतु जब “भक्त-वश्य”, “भक्त-वत्सल” आदि नाम सुनता हूँ, तो हृदय में भय उत्पन्न हो जाता है क्योंकि आपका भक्त तो मैं अभी हुआ नहीं।
भक्ति वश्य सुनि नाम पै, मन महँ अति डरपात ॥
- जगद्गुरु कृपालु जी महाराज, भक्ति शतक (90)
हे श्री कृष्ण! तुम्हारा पतित-पावन नाम सुनकर मन में आशा उत्पन्न होती है, क्योंकि मैं पतित हूँ और मेरा भी काम बन सकता है। किंतु जब “भक्त-वश्य”, “भक्त-वत्सल” आदि नाम सुनता हूँ, तो हृदय में भय उत्पन्न हो जाता है क्योंकि आपका भक्त तो मैं अभी हुआ नहीं।

