शिक्षापद्यानी - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

शिक्षापद्यानी - महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य

यदा बहिर्मुखा यूयं भविष्यथ कथञ्चन । तदा कालप्रवाहस्था देहचित्तादयोप्युत ॥ 1॥
सर्वथा भक्षयिष्यन्ति युष्मान् इति मतिर्मम । न लौकिकः प्रभुः कृष्णो मनुते नैव लौकिकम् ॥ 2॥


यदि तुम श्री कृष्ण से विमुख हो जाओगे तो कालिकाल के प्रभाव में रहने वाले तुम्हारा तन और मन समय के प्रवाह से तुम्हारा नाश कर देंगे ऐसा मेरा विश्वास है । श्री कृष्ण सांसारिक नहीं हैं और न ही वे सांसारिक लोगों की पूजा को स्वीकार करते हैं । (1-2)

भावस्तत्राप्यस्मदीयः सर्वस्वश्चैहिकश्च सः । परलोकश्च तेनायं सर्वभावेन सर्वथा ।
सेव्यः स एव गोपीशो विधास्यत्यखिलं हि नः ॥ 3॥


इस संसार में या किसी अन्य में श्री कृष्ण के लिए हमारा भाव हमारा सब कुछ है । गोपिजनवल्लभ की आराधना हर समय समस्त भावों के साथ की जानी चाहिए । (3)

तब श्रीकृष्ण उनके सामने प्रकट हुए और अंतिम उपदेश दिया ।

मयि चेऽस्ति विश्वासः श्रीगोपीजनवल्लभे । तदा कृतार्था यूयं हि शोचनीयं न कर्हिचित् ॥ 4॥

यदि आप मुझ पर विश्वास करते हैं, तो आप आध्यात्मिक रूप से कृतार्थ हैं और इसके अलावा और कुछ भी विचारने की आवशक्तया नहीं है । (4)

मुक्तिहित्वान्यथ रूपं स्वरूपेण व्यवस्थितिः ॥ 5॥

इसके उपरांत समस्त ज्ञान को ग्रहण कर आप अपने स्वरुप में स्थित हो जायेंगे, एवं मुक्त हो जायेंगे । (5)

- महाप्रभु श्री वल्लभाचार्य, शिक्षापद्यानी