हरि हरि हरि हरि सब कहैं, हरि को जानत नाहिं ।
हरि हैं साँची लाडिली, गहैं रसिक की बाँहि ॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (316)
जगत में अनेक लोग “हरि हरि” का नाम तो लेते हैं, परंतु अपने हरि के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानते। सत्य श्रीहरि स्वरूप तो स्वयं नित्य निकुंजेश्वरी श्री लाड़िली (राधा) जू हैं, जो रसिकों का हाथ पकड़कर सदा उनके साथ रहती हैं।
हरि हैं साँची लाडिली, गहैं रसिक की बाँहि ॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (316)
जगत में अनेक लोग “हरि हरि” का नाम तो लेते हैं, परंतु अपने हरि के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचानते। सत्य श्रीहरि स्वरूप तो स्वयं नित्य निकुंजेश्वरी श्री लाड़िली (राधा) जू हैं, जो रसिकों का हाथ पकड़कर सदा उनके साथ रहती हैं।

