ब्रह्मादिक वंदन करत और न कोऊ समतूल - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (159)

ब्रह्मादिक वंदन करत और न कोऊ समतूल - श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (159)

ब्रह्मादिक वंदन करत, और न कोऊ समतूल ।
श्रीराधा वैनी गुहन, सो प्रभु वीनै फूल ॥

- श्री हित रूप लाल, श्री वृंदावन स्मरण (159)

वह श्री वृन्दावन धाम, जिसका वंदन ब्रह्मा आदि देवता भी करते हैं और जिसकी समानता किसी अन्य स्थान से नहीं की जा सकती—वहीं साक्षात प्रभु श्री कृष्ण, श्री राधा की वेणी गूँथने के लिए पुष्प चुनते हैं।