लगी है लगनि प्यारे पगी है सुरति तोसों -  घनानंद जी, सुजान हित (242)

लगी है लगनि प्यारे पगी है सुरति तोसों - घनानंद जी, सुजान हित (242)

लगी है लगनि प्यारे पगी है सुरति तोसों,
जगी है बिकलताई ठगी सी सदा रहौं। [1]
जियरा उड्यौ सो डोलै हियरा धक्यौई करै,
पियराई छाई तन, सियराई दौ दहौं॥ [2]
ऊनो भयौ जीबो अब सूनो सब जग दीसैं,
दूनो दूनो दुख एक एक छिन मैं सहौं। [3]
तेरे तौ न लेखो, मोहिं मारत परेखो महा,
जान घनआनंद पै खोयबो लहा लहौं॥ [4]

- श्री घनानंद जी, घनानंद ग्रंथावली, सुजान हित (242)

[यह एक विरह का भाव है]
हे प्रियतम श्यामसुंदर! तुम्हीं से मेरी लगन लगी हुई है (अर्थात् मैं तुमको ही प्रेम करती हूँ) और तुम्हीं में मेरी स्मृति पगी हुई है (तुम्हारा ही मैं ध्यान करती रहती हूँ), इसलिए (तुम्हारे अभाव में) मेरे हृदय में व्याकुलता जाग उठी है और (व्याकुलता के कारण) मैं खोई-खोई सी रहती हूँ। [1]

तुम्हारे विरह में मेरा जी उड़ा-उड़ा सा रहता है (अर्थात चित्त अस्थिर रहता है, मन कहीं भी नहीं लगता), हृदय धड़कता रहता है, शरीर पर पीलापन छा गया है (अर्थात मैं विवर्ण हो गई हूँ) और मैं शीतल अग्नि में जलती रहती हूँ (अर्थात धीमी-धीमी सुलगती हुई आग में जलती रहती हूँ)। [2]

(तुम्हारे अभाव में) अब सारा संसार सूना-सूना दिखलाई पड़ता है और मेरा जीवन व्यर्थ-सा व्यतीत होता है - एक-एक क्षण में मैं दुगुना-दुगना दुःख सहन करती हूँ (अर्थात जो दुःख मैं सहन कर रही हूँ, वह प्रतिक्षण दुगुना होता चला जा रहा है)। [3]

(मेरे इस प्रकार दुःख सहन करने का) तेरे हृदय में तो कोई लेखा-जोखा (विचार) नहीं है - मुझे इसी का पछतावा मारे डाल रहा है। अत्यन्त आनन्द प्रदान करने वाले सुजान से मुझे खोने का ही लाभ प्राप्त होता है। अर्थात् सुजान के वियोग में खोई-खोई रहती हूँ, विस्मृति में डूबी रहती हूँ, यही मेरे लिए लाभ का विषय है। [4]