निमंत्र्य प्रातर्या निजहृदयनाथं निरूपमा समाकार्यै काकिन्यतिघनवनादात्मभवने ॥
विधायान्नं स्वादुस्वयमति मुदा भोजयति सामयि प्रीता राधा भवतु हरि संगार्पित मनाः ॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (3)
निज हृदयनाथ श्री कृष्ण को गूढ़ निमंत्रण दे प्रातः काल गुप्त रीती से अपने भवन में बुलाकर उनकी सेवा कर अति हर्ष से भोजन कराकर उनके संग से ह्रदय का विरह शमन करनेवाली श्री राधा नित्य मेरे ह्रदय में स्थित रहें ।
विधायान्नं स्वादुस्वयमति मुदा भोजयति सामयि प्रीता राधा भवतु हरि संगार्पित मनाः ॥
- श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (3)
निज हृदयनाथ श्री कृष्ण को गूढ़ निमंत्रण दे प्रातः काल गुप्त रीती से अपने भवन में बुलाकर उनकी सेवा कर अति हर्ष से भोजन कराकर उनके संग से ह्रदय का विरह शमन करनेवाली श्री राधा नित्य मेरे ह्रदय में स्थित रहें ।

