न मन्येहं लोकं न बहु निगमं तं बहुविधं
सतां श्लाघ्यं शुद्धं सुखदहरिभक्तिं च निपुणाम् ।
परं क्रीडत्कुंजे वनभुवि सदा श्यामहृदये,
पदद्वंद्वं जाने रुचिर ललिताहस्तकलितम् ॥
- श्री वृषभानुपुर शतक (103), श्री वंशी अली द्वारा रचित
मैं न लोक की और न वेद की बताई अनेक विधियों को मानता हूँ और न ही निपुण साधु-संतों की श्लाघ्य शुद्ध और सुखद हरि भक्ति को। परन्तु मैं तो वन भूमि में सदा श्यामसुन्दर के हृदय में क्रीड़ा करने वाले, ललिता के हाथों से सँवारे गये श्री राधा के युगल चरणों को ही जानता हूँ (अन्य कुछ नहीं जानता)।
सतां श्लाघ्यं शुद्धं सुखदहरिभक्तिं च निपुणाम् ।
परं क्रीडत्कुंजे वनभुवि सदा श्यामहृदये,
पदद्वंद्वं जाने रुचिर ललिताहस्तकलितम् ॥
- श्री वृषभानुपुर शतक (103), श्री वंशी अली द्वारा रचित
मैं न लोक की और न वेद की बताई अनेक विधियों को मानता हूँ और न ही निपुण साधु-संतों की श्लाघ्य शुद्ध और सुखद हरि भक्ति को। परन्तु मैं तो वन भूमि में सदा श्यामसुन्दर के हृदय में क्रीड़ा करने वाले, ललिता के हाथों से सँवारे गये श्री राधा के युगल चरणों को ही जानता हूँ (अन्य कुछ नहीं जानता)।

