श्री राधा विवि चरण वर करत उचारि-उचारि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (12)

श्री राधा विवि चरण वर करत उचारि-उचारि - श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (12)

श्री राधा विवि चरण वर करत उचारि-उचारि ।
क्वास, क्वास, हा स्वामिनी, दीरघ स्वास उसारि ॥ [1]
दीरघ स्वास उसारि फिरत वन वन में रानौं ।
बह्यौ नैंन जल धार हियौ अति ही अकुलानौं ॥ [2]
बूडयौ महा दुःख-सिन्धु गहौ कर आनि नवेली ।
लीजै कंठ लगाय चितै हंसि मोहि अलबेली ॥ [3]

- श्री अलबेली अलि, विनय कुंडलियाँ (12)

श्री राधा के चरणों को हृदय में धारण कर “हा स्वामिनी, कहाँ हो? कहाँ हो?” ऐसा उच्चारण कर पुनः लम्बी लम्बी साँसे भरता हूँ । [1]

लम्बी साँसों को धारण कर ब्रज के विभिन्न वनों में फिरते हुए अति ही अकुलाहट के साथ जल की धारा [प्रेम के आँसु] बहाता हूँ । [2]

हे नवेली, तुम्हारे वियोग में मैं महान दुःख के सिंधु में बहा जा रहा हूँ, अब तुम आकर मुझे क्यूँ नहीं सम्भाल लेती? श्री अलबेली अलि कहती हैं कि हे अलबेली स्वामिनी मुझे अब तो हंस कर अपना दर्शन देकर अपने हृदय से लगा लीजिए । [3]