चलि री भीर तें न्यारेई खेलैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (100)

चलि री भीर तें न्यारेई खेलैं - श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (100)

(राग बसंत)
चलि री भीर तें न्यारेई खेलैं  ।
कुंज निकुंज मंजु में झेलैं  ॥ [1]
जहाँ पंछी न सहित सखी न संग कोऊ
तिहिं बन चलि मिलि केलैं । [2]
श्रीहरिदास के स्वामी स्यामा प्रेम
परस्पर बूका बंदन मेलैं ॥ [3]

- ललिता अवतार श्री स्वामी हरिदास जी, केलीमाल (100)

श्री कृष्ण श्री राधिका से कहते हैं: हे प्यारी जी! भीड़ से हट एकान्त में क्यों न हम और आप कुंजों एवं निकुंजों के मध्य कोई न्यारा खेल खेलें ।[1]

जहां कोई न पक्षी हो, न कोई सखी हो, न ही अन्य कोई हो, केवल हम और आप ही हों, ऐसे वन में चल हम और आप केलि का रस बरसाएँ । [2]

श्री हरिदास जी के स्वामी श्यामा श्याम प्रेम रूपी बसंत के अनुराग से भरे अबीर गुलाल लगा रहे हैं, छिड़क रहे हैं अर्थात  प्रेम रस में डुबकी लगा रहे हैं। चारों ओर केवल अनुराग का रंग उड़ रहा है। [3]