बलि जाउँ निकुंज विहार की - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, निकुंज माधुरी (18)

बलि जाउँ निकुंज विहार की - जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, निकुंज माधुरी (18)

बलि जाउँ निकुंज विहार की ।
नागरि श्री वृषभानु कुँवरि अरु नागर नंदकुमार की ।। [1]
धरि जनु रूप अनूप प्रकट भइँ, मूरति छवि श्रृंगार की ।
करत केलि भुज मेलि विविध विधि, बरसावत रसधार की ।। [2]
संग नवेलिन, अति अलबेलिन, हेलिन यूथ अपार की ।
पियत 'कृपालु' रसिक निशि वासर, प्रेम सुधा रस सार की ।। [3]

- जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज, प्रेम रस मदिरा, निकुंज माधुरी (18)
 
एक सखी कहती है कि मैं वृषभानु नंदिनी श्री राधा एवं नंदकुमार श्री श्यामसुंदर के निकुंज विहार पर बाल बाल बलिहार जाती हूँ । [1]

मानो यह जोड़ी शृंगार एवं रूप की मूर्ति ही साक्षात् श्री राधा-कृष्ण का स्वरूप धारण करके प्रेम के अन्तरंग रसों को बरसाने के लिए अवतरित हुयी है। प्रिया प्रियतम परस्पर गले में हाथ डाले हुए विविध प्रकार की अन्तरंग लीला विहार करते हुए प्रेम रस को मूसलाधार बरसा रहे हैं, मैं उसकी भी बलयाँ लेती हूँ। [2]

प्रिया प्रियतम के साथ किशोर अवस्था वाली प्रेमरस की रंगीली ब्रजांगनाओं के झुंड की बार-बार बलैया लेती हूँ। श्री कृपालु जी कहते हैं कि प्रेमरस के सार-स्वरूप रस को रसिक लोग निरंतर ही पान किया करते हैं। [3]