अश्रान्तस्मितमरुणारुणाधरोष्ठं हर्षार्द्रद्विगुणमनोज्ञवेणुगीतम् ।
विभ्राम्यद्विपुलविलोचनार्धमुग्धं वीक्षिष्ये तब वदनाम्बुजं कदा नु ।।
- श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (47)
हे मुरलीघर ! तुम्हारे वदनाम्बुज को मैं कब देखूँगा, जिसमें अनवरत स्मित है, अरुण-अरुण अघर हैं, हर्ष से स्निग्ध द्विगुणित मनोहर वेणुगीत हैं तथा जो चंचल तथा विशाल लोचनों के अपांग बीक्षण से मनोहर हैं ।
विभ्राम्यद्विपुलविलोचनार्धमुग्धं वीक्षिष्ये तब वदनाम्बुजं कदा नु ।।
- श्री बिल्वमंगल, श्री कृष्ण कर्णामृतम (47)
हे मुरलीघर ! तुम्हारे वदनाम्बुज को मैं कब देखूँगा, जिसमें अनवरत स्मित है, अरुण-अरुण अघर हैं, हर्ष से स्निग्ध द्विगुणित मनोहर वेणुगीत हैं तथा जो चंचल तथा विशाल लोचनों के अपांग बीक्षण से मनोहर हैं ।

