आवत लाडिली लाल फूले - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (3)

आवत लाडिली लाल फूले - श्री विट्ठल विपुल देव जू की वाणी (3)

(राग विभास)
आवत लाडिली लाल फूले ।
कुंज केली नव रंग बिहारी,
सूरती हिंडोरैं झूले ।। [1]
निसी जागे अलसात रंगमगे,
पट पलटे गति भूले । [2]
श्रीबीठलबिपुल पुलकि ललितादिक,
दिन देखत द्रुम मूले। [3]

- श्री विठ्ठल विपुल देव जी, श्री विट्ठल विपुल देव जू की बानी (3)

प्रातःकालीन छटा का चित्रण करती हुई श्रीविपुल बिहारिनदासीजी कह रही हैं कि रस में प्रफुल्लित श्रीलाड़िली लाल आ रहे हैं। कुज-केलि के नवरंग में अनुरंजित सुरतरसानंद के हिंडोले में झूले हुए हैं । [1] 

केलि विहार में जागरण के कारण श्रीअंग में अलसान माधुरी आलोकित हो रही है। परस्पर के वस्त्र भी परिवर्तित हो गये हैं। रस की भरभार से इनके पद-विन्यास में लटपटापन दिग्दर्शित हो रहा है । [2]

श्रीविपुल विपुल जी की भी लालसा है कि पुलकित हुई ललितादिक सखियों के संग नित्यप्रति लता-वृक्षों की कुजों में अवस्थित होकर इस माधुरी का मैं भी अवलोकन करती रहूँ । [3]