गरजत मैं हूँ फिरौंगी प्यारी ।
तुम्हरे बल न गिनौंगी काहू, फिरिहौं शंक बिसारी ॥ [1]
निगम नीति कुलकानि मेटि तजि, लोक लीक सौं न्यारी ।
श्री वन मत्त मुदित विचरौंगी, प्रिया रूप मतवारी ॥ [2]
सिर पर हँसत स्वामिनी राधा, समरथ राखन हारी ।
'भोरी' पोच पतित अति पामर, तदपि हौंस हिय भारी ॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (431)
हे श्री राधे जू! मैं भी आपके बल पर गर्जना करते हुए [दहाड़ते हुए] श्रीवन में अवश्य ही डोलने लगूँगी। मैं अपनी सभी प्रकार की समस्त शंकाओं को भूलकर आपके बल पर किसी से भी भयभीत नहीं होऊँगी । [1]
मैं वेदों, शास्त्रों, कुल की मर्यादाओं एवं लोक-लाज की चिन्ता आदि का सर्वथा त्याग कर, श्रीवन की गलियों में प्रेम में विभोर होकर उन्मत्त अवस्था में विचरण करने लगूँगी और श्रीप्रियाजी की रूप माधुरी का पान कर मतवारी हो जाऊँगी । [2]
मेरे सिर पर श्री स्वामिनी राधे हँसते हुए अपना वरद हस्त रख देंगी तो मुझे किस बात की चिंता क्योंकि वह सर्वशक्तिमान हैं एवं अनाश्रितजनों को अपना सुखद आश्रय प्रदान करने वाली हैं। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि यद्यपि मैं बल बुद्धि-विद्या से सर्वथा हीन, अत्यन्त निन्दनीय पाप के कार्यों में लिप्त रहने वाली एवं अत्यन्त दुष्टा हूँ, तथापि मेरे हृदय में यह भारी विश्वास है कि श्री राधिका मुझपर कृपा अवश्य ही करेंगी । [3]
तुम्हरे बल न गिनौंगी काहू, फिरिहौं शंक बिसारी ॥ [1]
निगम नीति कुलकानि मेटि तजि, लोक लीक सौं न्यारी ।
श्री वन मत्त मुदित विचरौंगी, प्रिया रूप मतवारी ॥ [2]
सिर पर हँसत स्वामिनी राधा, समरथ राखन हारी ।
'भोरी' पोच पतित अति पामर, तदपि हौंस हिय भारी ॥ [3]
- श्री भोरी सखी, प्रेम की पीर (431)
हे श्री राधे जू! मैं भी आपके बल पर गर्जना करते हुए [दहाड़ते हुए] श्रीवन में अवश्य ही डोलने लगूँगी। मैं अपनी सभी प्रकार की समस्त शंकाओं को भूलकर आपके बल पर किसी से भी भयभीत नहीं होऊँगी । [1]
मैं वेदों, शास्त्रों, कुल की मर्यादाओं एवं लोक-लाज की चिन्ता आदि का सर्वथा त्याग कर, श्रीवन की गलियों में प्रेम में विभोर होकर उन्मत्त अवस्था में विचरण करने लगूँगी और श्रीप्रियाजी की रूप माधुरी का पान कर मतवारी हो जाऊँगी । [2]
मेरे सिर पर श्री स्वामिनी राधे हँसते हुए अपना वरद हस्त रख देंगी तो मुझे किस बात की चिंता क्योंकि वह सर्वशक्तिमान हैं एवं अनाश्रितजनों को अपना सुखद आश्रय प्रदान करने वाली हैं। श्रीहित भोरीसखी जी कहती हैं कि यद्यपि मैं बल बुद्धि-विद्या से सर्वथा हीन, अत्यन्त निन्दनीय पाप के कार्यों में लिप्त रहने वाली एवं अत्यन्त दुष्टा हूँ, तथापि मेरे हृदय में यह भारी विश्वास है कि श्री राधिका मुझपर कृपा अवश्य ही करेंगी । [3]

