अनाथं पतितं मूढं त्वदेक-पद जीवनम् ।
कृपा स्निग्धाबलोकेन पश्य वृन्दावनेश्वरी ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (63)
हे श्रीवृन्दावनेश्वरि [श्री राधा] ! इस अनाथ, पतित और मूढ़ की ओर एक बार भी तो अपनी स्नेहमयी कृपावलोकन से देख दीजिये; क्योंकि इसने केवल आपके ही चरणाश्रित जीवन को धारण कर रखा है।
कृपा स्निग्धाबलोकेन पश्य वृन्दावनेश्वरी ॥
- श्री हित कृष्ण चंद्र, श्री राधा उपसुधा निधि (63)
हे श्रीवृन्दावनेश्वरि [श्री राधा] ! इस अनाथ, पतित और मूढ़ की ओर एक बार भी तो अपनी स्नेहमयी कृपावलोकन से देख दीजिये; क्योंकि इसने केवल आपके ही चरणाश्रित जीवन को धारण कर रखा है।

