माँगौं न मोष भयोवास घोष - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक कवित्त (87)

माँगौं न मोष भयोवास घोष - श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह) जी की वाणी, छूटक कवित्त (87)

(सवैया)
माँगौं न मोष भयोवास घोष, (मैं) और अबैं न कछु जिय धारौं। [1]
या रज कै बिन जो जगमें, सब सो सुख लोभ हि तुच्छ बिचारों॥ [2]
लच्छन छत्रपतीन की लच्छमी, ‘नागर’ नैंननि हूँ न निहारौं। [3]
राज सबैं भुव मण्डल के, व्रज मण्डल ऊपर वारि के डारौं॥ [4]

- श्री नागरीदास (महाराज सावंत सिंह), श्री नागरीदास जी की वाणी, छूटक कवित्त (87)

न मुझे मोक्ष की अभिलाषा है, न ही मेरे हृदय में कोई अन्य चाह शेष है; मेरी तो बस यही कामना है कि मैं उस ब्रज में वास करूँ जहाँ गौएँ स्वतंत्र भाव से विचरण करती हैं। [1]

ब्रज की रज के बिना, संसार के सभी सुख और वैभव मुझे तुच्छ प्रतीत होते हैं। [2]

अब मुझे बड़े-बड़े सम्राटों के वैभव और लक्ष्मी आदि पर दृष्टि डालना भी नहीं सुहाता। [3]

श्री नागरीदास कहते हैं—ब्रज मंडल के लिए समस्त भुव मंडल का राज्य भी न्यौछावर कर देना चाहिए। [4]