बैठी है झरोखे प्यारी कुंज - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (100)

बैठी है झरोखे प्यारी कुंज - श्री केवल राम जी, रास मान के पद (100)

(राग केदार)
बैठी है झरोखे प्यारी कुंज भवन मों
महलु न पावे पीय ठाढे दरसन कों। [1]
उजारी तें उजारी माथे माँग सोहे गंगा जैसे
जानी हरि भए अतिहेतु परसन कों॥ [2]
जानी है बाति गुर भई ललिता जीउ
ल्याई हैं लालु तहाँ निधि बरसन कों। [3]
मिल्ये है मोहन राधा केवल छवि अगाधा
मेट्यो है दोऊ उर काम तरसन कों॥ [4]

- श्री केवल राम जी, रास मान के पद (100)

श्री राधिका कुंज महल में जालीदार खिड़की के पास बैठी हुई हैं। प्रियतम श्री कृष्ण महल के अंदर प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं, इसलिये वे बाहर खड़े होकर उनके दर्शन का इंतजार कर रहे हैं। [1]

श्री राधा का मस्तक साक्षात तेज से भी अधिक दैदीप्यमान है, और उनकी माँग के मोती गंगा की पावन धारा की तरह शुद्ध और निर्मल हैं। इस अद्वितीय सौंदर्य का ध्यान करते हुए श्री हरि श्री राधिका के स्पर्श के लिए अत्यधिक व्याकुल हो रहे हैं। [2]

दिव्य युगल श्री राधा और श्री कृष्ण की इस स्थिति को देखकर, श्री ललिता जी ने गुरु के समान व्यवहार करते हुए श्री कृष्ण को महल के बाहर से महल के भीतर प्रवेश कराया, ताकि उस निधि-रस की वर्षा हो सके। [3]

श्री केवलराम कहते हैं, "जब श्री राधा और श्री कृष्ण मिलते हैं, तो अथाह सौंदर्य की वर्षा होती है, और दोनों के हृदय से सभी तृष्णाएँ समाप्त हो जाती हैं।" [4]