प्रेम अगम अनुपम अमित सागर सरिस बखान - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (3)

प्रेम अगम अनुपम अमित सागर सरिस बखान - श्री रसखान, प्रेम वाटिका (3)

प्रेम अगम अनुपम अमित, सागर सरिस बखान ।
जो आवत यहि ढिग बहुरि, जात नहीं रसखान ॥

- श्री रसखान, प्रेम वाटिका (3)

रसखान कहते हैं कि प्रेम अगम्य (जिसको जाना न जा सके), अनुपम (जिसकी कोई उपमा न दी जा सके), सागर की भाँति अत्यंत गहरा एवं रसपूर्ण है। जो भी जीव एक बार इस प्रेम-सिंधु के निकट आ जाता है, वह फिर इसे छोड़कर अन्यत्र कहीं नहीं जाता।