राधे मेरे प्रान अधार ।
काहू कैं जीवनि काइ की, मेरैं तो तू ही निरधार ।। [1]
जुगल दरस की प्रीति रहौ नित, और न कोउ विचार ।
वेद भागवत स्मृति सबनि में, रूपमंजरी है इह सार ।। [2]
- श्री रूप मंजरी, जुगल रहस्य सिद्धांत (150)
श्री राधे जू मेरे प्राणों का आधार हैं । किसी का जीवन कुछ भी हो, परंतु सत्य तो यह है कि मेरा जीवन तो एक मात्र श्री राधा ही हैं । [1]
मेरे हृदय में युगल दर्शन की प्रीति नित्य ही बढ़ती रहे, इसके अतिरिक्त मेरे हृदय में कोई और विचार नहीं है । श्री रूप मंजरी कहती हैं, "वेद, भागवत, स्मृति और अन्य सभी ग्रंथों का सार भी यही है"। [2]
काहू कैं जीवनि काइ की, मेरैं तो तू ही निरधार ।। [1]
जुगल दरस की प्रीति रहौ नित, और न कोउ विचार ।
वेद भागवत स्मृति सबनि में, रूपमंजरी है इह सार ।। [2]
- श्री रूप मंजरी, जुगल रहस्य सिद्धांत (150)
श्री राधे जू मेरे प्राणों का आधार हैं । किसी का जीवन कुछ भी हो, परंतु सत्य तो यह है कि मेरा जीवन तो एक मात्र श्री राधा ही हैं । [1]
मेरे हृदय में युगल दर्शन की प्रीति नित्य ही बढ़ती रहे, इसके अतिरिक्त मेरे हृदय में कोई और विचार नहीं है । श्री रूप मंजरी कहती हैं, "वेद, भागवत, स्मृति और अन्य सभी ग्रंथों का सार भी यही है"। [2]

