हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय  - श्री मीरा जी

हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय - श्री मीरा जी

हे री मैं तो प्रेम दिवानी, मेरो दरद न जाने कोय ।। [1]
सूली ऊपर सेज हमारी, किस विध सोना होय । [2]
गगन मंडल पर सेज पिया की, किस विध मिलना होय ।। [3]
घायल की गति घायल जाने की जिन लागी होय । [4]
जौहरी की गति जौहरी जाने की जिन जोहर होय ।। [5]
दरद की मारी वन वन डोलू वैद मिल्यो नहीं कोय । [6]
मीरा के प्रभु पीर मिटे जद वैद्य सांवलिया होय ।। [7]

- श्री मीराबाई

हे सखी, मैं तो प्रेम दीवानी हूँ, मेरा दर्द कौन जाने ? [1]

मेरी सेज तो सूली के ऊपर है, मैं किस प्रकार चैन से सोऊँ ? [2]

मेरे प्रियतम श्यामसुंदर तो गगन मंडल पर विराजते हैं, किस तरह उनसे मैं मिलूँ ? [3]

केवल घायल ही घायल की गति जानता है, अन्य कोई नहीं जानता । [4]

जौहरी की गति भी जौहरी ही जानता है । [5]

मैं दर्द की मारी वन वन डोल रही हूँ, परंतु कोई वैद्य न मिला । [6]

मीरा की पीड़ा तो तभी मिटेगी जब वैद्य साक्षात साँवरिया [श्याम सुंदर] मिलेगा । [7]