(राग भैरो)
कोक कला संगीत लाल कौं,
सिखबति गति रस सानी। [1]
रूप बयस गुन की मरजादा,
पटतर कौं नहिं आनी॥ [2]
सेस गिरीस मेरु मंदर हिम
कंदर मैं तप ठानी। [3]
ग्रीवा सींव सकल सोभा की,
गीत कपोत उडानी॥ [4]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.2)
ये किशोरी जी [श्री राधा] लाल जी [श्री कृष्ण] को बड़ी रस भरी रीति से प्रेम शास्त्र का गीत संगीत सिखाया करती हैं। [1]
ये सुंदर रूप, किशोर वयस और समग्र गुणों की पराकाष्ठा हैं, इनकी तुलना के लिए अन्य कोई दूसरी नहीं है। [2]
इनके स्वरूप की एक झलक पाने के लिए ही भगवान् शेषनाग और भगवान् शंकर क्रमशः सुमेरु पर्वत और हिमाचल की कंदरा में निरंतर तप का अनुष्ठान कर रहे हैं। [3]
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि इनकी ग्रीवा (गरदन) संपूर्ण शोभा की सीमा है, इसीलिए कबूतरों का झुंड अपनी सुंदर गरदन होने के अभिमान को त्यागकर और (लज्जित होकर) आकाश में उडता फिरता है। [4]
कोक कला संगीत लाल कौं,
सिखबति गति रस सानी। [1]
रूप बयस गुन की मरजादा,
पटतर कौं नहिं आनी॥ [2]
सेस गिरीस मेरु मंदर हिम
कंदर मैं तप ठानी। [3]
ग्रीवा सींव सकल सोभा की,
गीत कपोत उडानी॥ [4]
- श्री भगवत रसिक, श्री भगवत रसिक की वाणी, अनन्यरसीकाभरण ग्रन्थ (1.20.2)
ये किशोरी जी [श्री राधा] लाल जी [श्री कृष्ण] को बड़ी रस भरी रीति से प्रेम शास्त्र का गीत संगीत सिखाया करती हैं। [1]
ये सुंदर रूप, किशोर वयस और समग्र गुणों की पराकाष्ठा हैं, इनकी तुलना के लिए अन्य कोई दूसरी नहीं है। [2]
इनके स्वरूप की एक झलक पाने के लिए ही भगवान् शेषनाग और भगवान् शंकर क्रमशः सुमेरु पर्वत और हिमाचल की कंदरा में निरंतर तप का अनुष्ठान कर रहे हैं। [3]
श्री भगवत रसिक जी कहते हैं कि इनकी ग्रीवा (गरदन) संपूर्ण शोभा की सीमा है, इसीलिए कबूतरों का झुंड अपनी सुंदर गरदन होने के अभिमान को त्यागकर और (लज्जित होकर) आकाश में उडता फिरता है। [4]

