(राग सारंग)
प्रीति न काहु की कानि बिचारै ।
मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै ।। [1]
ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै ।
ज्यौं नादहि मन दियें कुरंगनि प्रगट पारधी मारै ।। [2]
(जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहि जारै ।
नाइक निपून नवल मोहन बिनु कौन अपनपौ हारै ।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (42)
प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती । अरे ! प्रेम से विशेष विवश मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ? [1]
श्रावण मास के जल से उमंगे भरती हुई नदी जैसे सीधे समुद्र की ही ओर दौड़ती है और जिस प्रकार ( बहेलिये के द्वारा गाये हुए मधुर ) नाद में ही मन दिये हुए कुरंग ( हरिन ) को बहेलिया प्रत्यक्ष रूप से मार डालता है, परन्तु फिर भी इनको बहने और मरने से कोई निवृत्त नहीं कर सकता । [2]
उसी प्रकार शलभ दीपक की अटक ( आसक्ति ) में अपने देह को भी जला डालता है , ( वह भी किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करता । ) श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभुपाद) कहते हैं कि नवल मोहन जैसे निपुण नायक ( प्रेमी ) के सिवाय और कौन ऐसा है जो ( प्रेम में ) अपना अपनापन – स्वाभिमान भी खो दे या हार जाय । [3]
प्रीति न काहु की कानि बिचारै ।
मारग अपमारग विथकित मन को अनुसरत निवारै ।। [1]
ज्यौं सरिता साँवन जल उमगत सनमुख सिंधु सिधारै ।
ज्यौं नादहि मन दियें कुरंगनि प्रगट पारधी मारै ।। [2]
(जै श्री) हित हरिवंश हिलग सारँग ज्यौं सलभ सरीरहि जारै ।
नाइक निपून नवल मोहन बिनु कौन अपनपौ हारै ।। [3]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित चौरासी (42)
प्रीति किसी की मर्यादा नहीं मानती । अरे ! प्रेम से विशेष विवश मन को किसी मार्ग कुमार्ग की ओर जाने से कौन निवारण कर सकता है ? [1]
श्रावण मास के जल से उमंगे भरती हुई नदी जैसे सीधे समुद्र की ही ओर दौड़ती है और जिस प्रकार ( बहेलिये के द्वारा गाये हुए मधुर ) नाद में ही मन दिये हुए कुरंग ( हरिन ) को बहेलिया प्रत्यक्ष रूप से मार डालता है, परन्तु फिर भी इनको बहने और मरने से कोई निवृत्त नहीं कर सकता । [2]
उसी प्रकार शलभ दीपक की अटक ( आसक्ति ) में अपने देह को भी जला डालता है , ( वह भी किसी मर्यादा को स्वीकार नहीं करता । ) श्रीहित हरिवंश चन्द्र (महाप्रभुपाद) कहते हैं कि नवल मोहन जैसे निपुण नायक ( प्रेमी ) के सिवाय और कौन ऐसा है जो ( प्रेम में ) अपना अपनापन – स्वाभिमान भी खो दे या हार जाय । [3]

