(कवित्त)
परौ आय द्वार सुनि सुजस अपार चारु,
कबहू तौ कृपा की कटाक्ष सों तकाऔगी। [1]
सहचरि संग पाऊँ सेवा रुख ओर धाऊं,
पद सहराऊँ तबै हेर सचु पाऔगी॥ [2]
'लाल बलबीर' दासी जानकें सदैव पासी,
राखौ सुखरासी चाह चित की पुजाऔगी। [3]
दोऊ कर जोरी करूँ विनती करोरी गोरी,
हा हा श्रीकिसोरी ऐसें कब अपनाऔगी॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (36)
हे श्री राधे, आपका अपार सुंदर यश सुनकर ही मैं आपके द्वार आकर पड़ी हुई हूँ, ऐसा कब होगा कि अब आप मुझे अपनी कृपा की दृष्टि से निहारोगी ? [1]
ऐसा कब होगा कि आपकी सहचरियों के संग, मैं भी विभिन्न कुंजों में आपकी सेवा करूँगी एवं आपकी चरण सेवा प्राप्त करूँगी एवं तभी आपको निहार निहार कर सुख प्राप्त करूँगी ? [2]
हे सुख राशी, ऐसा कब होगा कि मुझे अपनी निज दासी जानकर आप सदैव मुझे अपने संग ही रखोगी, ऐसी मेरे हृदय की अभिलाषा कब पूर्ण करोगी ? [3]
हे गोरी! हे किशोरी! दोनों हाथों को जोड़कर यही विनती करती हूँ कि इस प्रकार से मुझे आप कब अपनाओगी ? [4]
परौ आय द्वार सुनि सुजस अपार चारु,
कबहू तौ कृपा की कटाक्ष सों तकाऔगी। [1]
सहचरि संग पाऊँ सेवा रुख ओर धाऊं,
पद सहराऊँ तबै हेर सचु पाऔगी॥ [2]
'लाल बलबीर' दासी जानकें सदैव पासी,
राखौ सुखरासी चाह चित की पुजाऔगी। [3]
दोऊ कर जोरी करूँ विनती करोरी गोरी,
हा हा श्रीकिसोरी ऐसें कब अपनाऔगी॥ [4]
- श्री लाल बलबीर जी, ब्रज बिनोद, वृन्दावन शतक (36)
हे श्री राधे, आपका अपार सुंदर यश सुनकर ही मैं आपके द्वार आकर पड़ी हुई हूँ, ऐसा कब होगा कि अब आप मुझे अपनी कृपा की दृष्टि से निहारोगी ? [1]
ऐसा कब होगा कि आपकी सहचरियों के संग, मैं भी विभिन्न कुंजों में आपकी सेवा करूँगी एवं आपकी चरण सेवा प्राप्त करूँगी एवं तभी आपको निहार निहार कर सुख प्राप्त करूँगी ? [2]
हे सुख राशी, ऐसा कब होगा कि मुझे अपनी निज दासी जानकर आप सदैव मुझे अपने संग ही रखोगी, ऐसी मेरे हृदय की अभिलाषा कब पूर्ण करोगी ? [3]
हे गोरी! हे किशोरी! दोनों हाथों को जोड़कर यही विनती करती हूँ कि इस प्रकार से मुझे आप कब अपनाओगी ? [4]

