प्रियेणाक्ष्णा संसूचित् नवनिकुंजेषु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (6)

प्रियेणाक्ष्णा संसूचित् नवनिकुंजेषु - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (6)

प्रियेणाक्ष्णा संसूचित् नवनिकुंजेषु बिविधप्रसूनै र्निर्मायातिशय रुचिरं केलिशयनम् ।
दिवाष्येषां गुंजन्मधुपमुखरे धीरपवनाश्रिते क्रीडंती में निज चरण दास्यं वितरतु ॥

 - श्री विट्ठलनाथ जी (गुसाईं जी), श्री स्वामिनियाष्टकम् (6)
 
प्रियतम ने अपने नेत्रों द्वारा श्री प्रिया जी को नव निकुंज में पधारने के लिए सूचित किया जहां केलि लीला हेतु घने वन में अनेक रंगों के पुष्पों एवं चित्रों से अति सुंदर सेज की रचना की है, जहाँ अनेक भौंरे गुंजार कर रहे हैं, पवन मंद मंद बह रहा है, ऐसी गुप्त कुंज में श्री राधा मुझे अपने चरणों की सेवा प्रदान करें ।