ऐसो चटक मटक सो ठाकुर तीनों लोकन हूँ में नाय ।। [1]
तीन ठौर ते टेढ़ो दीखै, नट की सी चलगत ऐ सीखे ।
टेढ़े नैंन चलावे तीखे ।
सब देवन को देव, तऊ ये ब्रज में घेरे गाय ।। ऐसो…. ।। [2]
ब्रह्मा मोह कियो पछताओ, मान इन्द्र को दूर भगायो ।
दर्शन को शिव ब्रज में आयो ।
ऐसो वैभव वारो तऊ पैं ब्रज में गारी खाय ।। ऐसो…. ।। [3]
बड़ बड़े असुरन को मारौ । नाग कालिया पकर पछारौ ।
सात दिना तक गिरवर धारौ।
ऐसो बली तऊ ग्वालिन ते खेलत में पिट जाय ।। ऐसो…. ।। [4]
रूप छबीलो है ब्रज सुन्दर । बिना बुलाये डोले घर घर ।
‘प्रेमी’ ब्रज गोपिन को चाकर ।
ऐसा प्रेम बँध्यो माखन को चोरी करवे जाय ।। ऐसो…. ।। [5]
- श्री प्रेमी जी [ब्रज के लोक गीत]
ऐसा चटकीला एवं मटकीला बाँके बिहारी जैसा ठाकुर तो तीनों लोकों में कहीं नहीं है । [1]
यह तीन ठौर से टेढ़ा है जिसके करतब नट के समान हैं एवं अपनी तिरछे नयनों से सब पर तीर चलाता है । यह सब देवों का देव है, एवं ब्रज में गायों को चराता है । [2]
ऐसे ठाकुर की लीलाओं को देखकर ब्रह्मा जी को मोह हो जाता है [बाद में वह पछताते हैं], जिसने इंद्र का मान दूर भगाया था, जिसके दर्शन के हेतु ही शिवजी ब्रज में आए थे । जिस ठाकुर का ऐसा वैभव है, वह ब्रज में, गोपियों की गालियाँ खा कर आनंदित होता है । [3]
जिसने बड़े बड़े असुरों को मारा है, नाग कालिया को एक क्षण में परास्त कर दिया, जिसने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठा कर रखा, ऐसे बलशाली ठाकुर, ब्रज में ग्वाल बालों से, उन्हें सुख देने के लिए पिट जाता है । [4]
श्री प्रेमी जी कहते हैं कि जिसका रूप छबीला है, जो ब्रज में हर घर में बिन बुलाए ही डोलता रहता है, जो ब्रज की गोपियों का चाकर है, ऐसा ठाकुर प्रेम के बंधन में बंध कर उन गोपियों के माखन की चोरी करता है । [5]
तीन ठौर ते टेढ़ो दीखै, नट की सी चलगत ऐ सीखे ।
टेढ़े नैंन चलावे तीखे ।
सब देवन को देव, तऊ ये ब्रज में घेरे गाय ।। ऐसो…. ।। [2]
ब्रह्मा मोह कियो पछताओ, मान इन्द्र को दूर भगायो ।
दर्शन को शिव ब्रज में आयो ।
ऐसो वैभव वारो तऊ पैं ब्रज में गारी खाय ।। ऐसो…. ।। [3]
बड़ बड़े असुरन को मारौ । नाग कालिया पकर पछारौ ।
सात दिना तक गिरवर धारौ।
ऐसो बली तऊ ग्वालिन ते खेलत में पिट जाय ।। ऐसो…. ।। [4]
रूप छबीलो है ब्रज सुन्दर । बिना बुलाये डोले घर घर ।
‘प्रेमी’ ब्रज गोपिन को चाकर ।
ऐसा प्रेम बँध्यो माखन को चोरी करवे जाय ।। ऐसो…. ।। [5]
- श्री प्रेमी जी [ब्रज के लोक गीत]
ऐसा चटकीला एवं मटकीला बाँके बिहारी जैसा ठाकुर तो तीनों लोकों में कहीं नहीं है । [1]
यह तीन ठौर से टेढ़ा है जिसके करतब नट के समान हैं एवं अपनी तिरछे नयनों से सब पर तीर चलाता है । यह सब देवों का देव है, एवं ब्रज में गायों को चराता है । [2]
ऐसे ठाकुर की लीलाओं को देखकर ब्रह्मा जी को मोह हो जाता है [बाद में वह पछताते हैं], जिसने इंद्र का मान दूर भगाया था, जिसके दर्शन के हेतु ही शिवजी ब्रज में आए थे । जिस ठाकुर का ऐसा वैभव है, वह ब्रज में, गोपियों की गालियाँ खा कर आनंदित होता है । [3]
जिसने बड़े बड़े असुरों को मारा है, नाग कालिया को एक क्षण में परास्त कर दिया, जिसने सात दिन तक गोवर्धन पर्वत उठा कर रखा, ऐसे बलशाली ठाकुर, ब्रज में ग्वाल बालों से, उन्हें सुख देने के लिए पिट जाता है । [4]
श्री प्रेमी जी कहते हैं कि जिसका रूप छबीला है, जो ब्रज में हर घर में बिन बुलाए ही डोलता रहता है, जो ब्रज की गोपियों का चाकर है, ऐसा ठाकुर प्रेम के बंधन में बंध कर उन गोपियों के माखन की चोरी करता है । [5]

