जा मारग मेरौ गुरु चलयौ, ता मारग हौं जाऊँ ।
और जिते मारग सबै, तिन्हैं न हौं पतिआऊँ॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (557)
जिस मार्ग पर मेरे सद्गुरु चले हैं, मैं भी उसी मार्ग का अनुसरण करूँगा। उनके बताए हुए स्वामी हरिदास जी के रस-उपासना-मार्ग के अतिरिक्त संसार में जितने भी अन्य मार्ग (मत-मतान्तर) हैं, मैं उन पर रंचक मात्र भी विश्वास नहीं करता।
और जिते मारग सबै, तिन्हैं न हौं पतिआऊँ॥
- श्री ललितकिशोरी देव, श्री ललितकिशोरी देव जू की वाणी, सिद्धान्त की साखी (557)
जिस मार्ग पर मेरे सद्गुरु चले हैं, मैं भी उसी मार्ग का अनुसरण करूँगा। उनके बताए हुए स्वामी हरिदास जी के रस-उपासना-मार्ग के अतिरिक्त संसार में जितने भी अन्य मार्ग (मत-मतान्तर) हैं, मैं उन पर रंचक मात्र भी विश्वास नहीं करता।

