व्यास दीनता के सुखहि, कह जानैं जग मंद ।
दीन भये तें मिलत हैं, दीनबंधु सुखकंद॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (95)
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि परम दीनता (विनम्रता और निरभिमानता) में निहित परम सुख को यह मंदबुद्धि संसार क्या जाने? जब भक्त स्वयं को सर्वथा असमर्थ और दीन मानकर प्रभु की शरण लेता है, तभी दीनबन्धु और सुखों के मूल कंद श्री कृष्ण उसे प्राप्त होते हैं।
दीन भये तें मिलत हैं, दीनबंधु सुखकंद॥
- श्री हरिराम व्यास, व्यास वाणी, सिद्धांत की साखी (95)
श्री हरिराम व्यास जी कहते हैं कि परम दीनता (विनम्रता और निरभिमानता) में निहित परम सुख को यह मंदबुद्धि संसार क्या जाने? जब भक्त स्वयं को सर्वथा असमर्थ और दीन मानकर प्रभु की शरण लेता है, तभी दीनबन्धु और सुखों के मूल कंद श्री कृष्ण उसे प्राप्त होते हैं।

