ताकत शरीर में न रही श्याम सुन्दर जो।
ध्रुव के समान एक पैर पै खड़ा रहूँ॥ [1]
ऐसी आत्म दृढ़ता कदापि नहीं मॉमें जो।
भीष्म के तुल्य किसी प्रण पै अड़ा रहूँ॥ [2]
चैतन्य महाप्रभु जैसी चैतन्यता कहाँ।
कि डूब प्रेम सिन्धु में सदा बन उमड़ा रहूँ॥ [3]
सोचा इस हेतु मैंने साधन सरल यही।
वृन्दावन बीच किसी कुञ्ज में पड़ा रहूँ॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (75)
हे श्याम सुंदर, मेरे इस मायिक शरीर में इतनी ताक़त कहाँ कि मैं ध्रुव के समान एक पैर पर खड़े होकर भजन करूँ ।[1]
भीष्म पितामह की तरह ऐसी दृढ़ता भी कहाँ कि कोई प्रण लेकर उस पर अड़ा ही रहूँ। [2]
श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह ऐसा प्रेम भी कहाँ है कि प्रेम सिंधु में विभोर होकर सदा उन्मत्त रहूँ। [3]
इसीलिए एक सरल साधन मुझे समझ आया है कि मेरे से और कुछ हो या ना हो, मैं तो बस श्री वृंदावन धाम की किसी कुंज में श्री राधा रानी के भरोसे पड़ा रहूँ। [4]
ध्रुव के समान एक पैर पै खड़ा रहूँ॥ [1]
ऐसी आत्म दृढ़ता कदापि नहीं मॉमें जो।
भीष्म के तुल्य किसी प्रण पै अड़ा रहूँ॥ [2]
चैतन्य महाप्रभु जैसी चैतन्यता कहाँ।
कि डूब प्रेम सिन्धु में सदा बन उमड़ा रहूँ॥ [3]
सोचा इस हेतु मैंने साधन सरल यही।
वृन्दावन बीच किसी कुञ्ज में पड़ा रहूँ॥ [4]
- डंडी स्वामी श्री हरे कृष्णानन्द सरस्वती ‘हरे कृष्ण’, वृंदावन शतक (75)
हे श्याम सुंदर, मेरे इस मायिक शरीर में इतनी ताक़त कहाँ कि मैं ध्रुव के समान एक पैर पर खड़े होकर भजन करूँ ।[1]
भीष्म पितामह की तरह ऐसी दृढ़ता भी कहाँ कि कोई प्रण लेकर उस पर अड़ा ही रहूँ। [2]
श्री चैतन्य महाप्रभु की तरह ऐसा प्रेम भी कहाँ है कि प्रेम सिंधु में विभोर होकर सदा उन्मत्त रहूँ। [3]
इसीलिए एक सरल साधन मुझे समझ आया है कि मेरे से और कुछ हो या ना हो, मैं तो बस श्री वृंदावन धाम की किसी कुंज में श्री राधा रानी के भरोसे पड़ा रहूँ। [4]

