मैं जु मोहन सुन्यौ बेनु गोपाल कौ। [1]
व्योम मुनि यान, सुन नारि सुनि चकित भई,
कहत नहीं बनत कछु भेद यति ताल कौ॥ [2]
श्रवन कुंडल छुरित, रूरत कुंतल ललित,
रूचिर कस्तूरि चंदन तिलक भाल कौ। [3]
चंद-गति मंद भई, निरखि छवि काम गहि,
देखि हरिवंश हित वेष नंदलाल कौ॥ [4]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (13)
मैंने मदनगोपाल के मोहक वेणुनाद को सुना है। [1]
इस अद्भुत नाद को सुनकर आकाश में स्थित मुनियानों (विमानों) में बैठी हुई देवताओं की स्त्रियाँ थकित हो गईं। अतः इस नाद की यति और ताल का भेद कहना सम्भव नहीं है। [2]
(वेणुवादक श्रीनंदलाल के) श्रवण कुण्डलों से भूषित हैं, उनकी अलकें छूट रही हैं, और कस्तूरी मिश्रित चंदन का सुन्दर तिलक उनके भाल पर सुशोभित है। [3]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि नन्दलाल का यह वेष देखकर चन्द्र की गति मन्द हो गई है और कामदेव की छवि क्षीण हो गई है।
(चन्द्र मन का देवता है, नंदलाल के दर्शन से उसकी गति मन्द होने का अर्थ यह है कि मन निश्चल हो गया है। कामदेव मनोज है, उसकी छबि क्षीण हो जाने का तात्पर्य यह है कि नन्दलाल के दर्शन से मत्त में काम के प्रति आकर्षण नष्ट हो गया है।) [4]
व्योम मुनि यान, सुन नारि सुनि चकित भई,
कहत नहीं बनत कछु भेद यति ताल कौ॥ [2]
श्रवन कुंडल छुरित, रूरत कुंतल ललित,
रूचिर कस्तूरि चंदन तिलक भाल कौ। [3]
चंद-गति मंद भई, निरखि छवि काम गहि,
देखि हरिवंश हित वेष नंदलाल कौ॥ [4]
- श्री हित हरिवंश महाप्रभु, श्री हित स्फुट वाणी (13)
मैंने मदनगोपाल के मोहक वेणुनाद को सुना है। [1]
इस अद्भुत नाद को सुनकर आकाश में स्थित मुनियानों (विमानों) में बैठी हुई देवताओं की स्त्रियाँ थकित हो गईं। अतः इस नाद की यति और ताल का भेद कहना सम्भव नहीं है। [2]
(वेणुवादक श्रीनंदलाल के) श्रवण कुण्डलों से भूषित हैं, उनकी अलकें छूट रही हैं, और कस्तूरी मिश्रित चंदन का सुन्दर तिलक उनके भाल पर सुशोभित है। [3]
श्रीहित हरिवंश कहते हैं कि नन्दलाल का यह वेष देखकर चन्द्र की गति मन्द हो गई है और कामदेव की छवि क्षीण हो गई है।
(चन्द्र मन का देवता है, नंदलाल के दर्शन से उसकी गति मन्द होने का अर्थ यह है कि मन निश्चल हो गया है। कामदेव मनोज है, उसकी छबि क्षीण हो जाने का तात्पर्य यह है कि नन्दलाल के दर्शन से मत्त में काम के प्रति आकर्षण नष्ट हो गया है।) [4]

