राधे नाम सुन्यौ जब स्याम - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (62)

राधे नाम सुन्यौ जब स्याम - श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (62)

राधे नाम सुन्यौ जब स्याम ।
बढ़ी विपुल पुलकावली अंग अंग भए सकल सव सुख के धाम ।। [1]
रोम-रोम रस रंग रगमग्यौ प्रेम मन पूरन काम ।
रूपरसिक बड़भाग मनावत अनुरागी अपनौं अभिराम ।। [2]

- श्री रूप रसिक देवाचार्य, नित्य विहार पदावली (62)

श्री श्यामसुंदर को “राधे" नाम इतना रुचिकर है कि जब श्री श्यामसुंदर के कर्ण में “राधे” नाम पड़ता है तो उनके अंग अंग में प्रगाढ़ पुलकावाली जागृत हो उठती है एवं उनका अंग अंग सुख का धाम बन जाता है  । [1] 

इस श्री “राधे” नाम के प्रभाव से श्री श्यामसुंदर का रोम रोम प्रेम के रस-रंग में रंग जाता है एवं उनके मन की सभी अभिलाषाएँ मानों पूर्ण हो जाती हैं । श्री रूप रसिक देवाचार्य जी कहते हैं कि श्री श्यामसुंदर इतने अनुरागी है इस “राधे” नाम के कि वह “राधे" नाम को सुनकर ही अपने आपको बढ़भागी मानते हैं अर्थात् वह यह सोचते हैं कि मेरे कितने भाग्य हैं जो मुझे श्री “राधे" नाम सुनाई दिया है । [2]